Saturday, 8 August 2015

प्रधानमंत्री मोदी के जोकर पर मुख्यमंत्री नीतीश का दहला

नीतीश कुमार एक माहिर राजनीतिज्ञ हैं। ऐसे में वो कोई दांव चलें और उसमें राजनीति नहीं हो ये कैसे हो सकता है? उन्होंने ‪#‎डीएनए‬ वाले मुद्दे को सूक्ष्मता से जांच-परख कर उठाया है।

बिहार में नीतीश कुमार की असली ताक़त अति पिछड़ा समुदाय के अंतर्गत आने वाले वोट हैं। वैसे माना यह भी जाता है कि नीतीश कुमार स्वयं देसवाल कुर्मी (धानुक) हैं जो कि बिहार की अति पिछड़ी समुदाय का हिस्सा है। ऐसे में अपने #डीएनए को बिहारी अस्मिता से जोड़कर नीतीश कुमार इन वोटरों को अपनी ओर बनाये रखने की जुगत में हैं

चूँकि लालू प्रसाद के साथ आने से इन जातियों के युवा वोटर विद्रोह के मूड में नज़र आ रहे हैं। क्योंकि बिहार में राबड़ी देवी के अंतिम 5 वर्षों के शासनकाल के दौरान अगर सबसे ज्यादा पीड़ित कोई समुदाय रहा है तो वो यही समुदाय रहा है। बिहार की राजनीत में अगड़ों के बाद यह समुदाय लालू को सीधे तौर पर पसंद नहीं करता है।

नीतीश ने सत्ता में आने के बाद इनका नेता बनने की पुरजोर कोशिश की जिसमें वे सफल भी रहे। अति पिछड़े को नौकरियों में अतिरिक्त आरक्षण, पंचायत चुनाव में आरक्षण देकर नीतीश इस समुदाय के बीच हीरो बन गए। यहाँ तक कि मोदी लहर वाले लोकसभा चुनाव में भी इन्हीं वोटरों के साथ का असर रहा कि जदयू को बिहार में 16 फीसदी वोट आये।

बिहार भाजपा भी इस बात को भली-भांति जानती है कि आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान 90 फीसदी अगड़े और वैश्य उनको वोट करने जा रहे हैं। इसलिए वो अपनी उपलब्धियों से ज्यादा लालू प्रसाद के तथाकथित जंगलराज के डर को प्रचारित करने में लगी है। क्योंकि ऐसा करने से जो भी ट्रान्सफर्ड वोट उसके खेमे में आएगा वह बोनस ही होगा।

नीतीश ने मौके की नजाकत को समझते हुए 25 जुलाई को मोदी द्वारा कही बात पर 5 अगस्त को पीएम मोदी को चिट्ठी लिखा। ये इस बात की ओर इशारा करता है कि यह सोच-समझ कर लिया गया कदम है। हो सकता है कि बिहार के बड़े हिस्से को मोदी द्वारा नीतीश के डीएनए को ख़राब बताना ना अखरे लेकिन, नीतीश की नज़र जिन लोगों तक अपनी बात पहुँचाने की थी वो इसमें सफल नज़र आ रहे हैं।

नीतीश ने यह चिट्ठी लिखकर मोदी के आक्रमक चुनाव प्रचार के तरीके को भी सेंसर करने की एक कोशिश की है। बिहार चुनाव का नतीजा चाहे जो भी हो लेकिन राजनीतिक दाँव बड़े दिलचस्प होने वाले हैं।

बहियार से लाइव
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